गुरूर था जिन्हें अपने ही उसूलों को दूसरों पे थोपने का
आज उन्हीं उसूलों से समझौता करते देखा है।
मैंने इसी युग में लोगों को बदलते देखा है।
खेलते थे पैसों को खिलौना समझ के वो दिन भी देखे है
आज पैसों को हिसाब में तब्दील कर छुप छुप कर कहीं लिखते हुए देखा है
फक्र से कदमों को जमीन नसीब नही करवाते थे जो
आज एक बित्ते की जमीन में घर बनाकर रहते देखा है।
जब जाकर समझ आया की इस जन्म का पाप है
इसी जन्म भोगना है, देर हो चुकी थी तबतक
आज आंचल के तले छलके नीर को छुपाते देखा है।
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