Tuesday, November 22, 2022

समय समय की बात है

 गुरूर था जिन्हें अपने ही उसूलों को दूसरों पे थोपने का

आज उन्हीं उसूलों से समझौता करते देखा है।

मैंने इसी युग में लोगों को बदलते देखा है।


खेलते थे पैसों को खिलौना समझ के वो दिन भी देखे है

आज पैसों को हिसाब में तब्दील कर छुप छुप कर कहीं लिखते हुए देखा है

फक्र से कदमों को जमीन नसीब नही करवाते थे जो

आज एक बित्ते की जमीन में घर बनाकर रहते देखा है।


जब जाकर समझ आया की इस जन्म का पाप है

इसी जन्म भोगना है, देर हो चुकी थी तबतक

आज आंचल के तले छलके नीर को छुपाते देखा है।

No comments:

Post a Comment

मौसम था बेईमान...

पीने का नशा न था मुझको यू ही शौक से दो घुट उतार लिए  आज मौसम था बेईमान तो बस पांच मिनट महखाने में गुजार लिए  एक अलग सी दुनिया की अनुभूति मिल...