Friday, November 25, 2022

मौसम था बेईमान...

पीने का नशा न था मुझको यू ही शौक से दो घुट उतार लिए 
आज मौसम था बेईमान तो बस पांच मिनट महखाने में गुजार लिए 


एक अलग सी दुनिया की अनुभूति मिली
लड़खड़ाए जो कदम, एकदम से सैकड़ो की सहानभूति मिली


होश में आने का कतई मन न था, लगा यही तो दस्तूर है
पर करते भी तो क्या, याद आया घर अभी बहोत दूर है


तीसरे जाम ने जब तक मेरे पैमाने को छुआ तब तक निकल पड़ा मैं
संभालता किसी तरह राह को साख बनाए चल पड़ा मैं


लोगो को कहते सुना है कि मर्द को दर्द नही होता
उनको क्या पता बहोत होता है, वरना मैं छुप के न रोता


तो क्या अब मेरे मर्दानगी पे सवाल उठाएगा ज़माना
तो फिर आज की जाम हो जाए बिना पैमाना


टिक गए आज तो फिर मानोगे न मेरी मर्दानगी को
फिर कुछ ना कहना देख के मेरी रवानगी को...

Tuesday, November 22, 2022

समय समय की बात है

 गुरूर था जिन्हें अपने ही उसूलों को दूसरों पे थोपने का

आज उन्हीं उसूलों से समझौता करते देखा है।

मैंने इसी युग में लोगों को बदलते देखा है।


खेलते थे पैसों को खिलौना समझ के वो दिन भी देखे है

आज पैसों को हिसाब में तब्दील कर छुप छुप कर कहीं लिखते हुए देखा है

फक्र से कदमों को जमीन नसीब नही करवाते थे जो

आज एक बित्ते की जमीन में घर बनाकर रहते देखा है।


जब जाकर समझ आया की इस जन्म का पाप है

इसी जन्म भोगना है, देर हो चुकी थी तबतक

आज आंचल के तले छलके नीर को छुपाते देखा है।

मौसम था बेईमान...

पीने का नशा न था मुझको यू ही शौक से दो घुट उतार लिए  आज मौसम था बेईमान तो बस पांच मिनट महखाने में गुजार लिए  एक अलग सी दुनिया की अनुभूति मिल...